नोएडा

AC बसें खाली, ऑटो में भीड़! आखिर यात्रियों की पसंद क्या है?

भीषण गर्मी में ₹20 के टिकट पर भी खाली दौड़ रहीं प्राधिकरण की ई-बसें; सवारी गायब, नियमों की उड़ रही धज्जियां और पुरानी मांग पर खड़े हो रहे सवाल।

Reported by Kashish Solanki and edited by Kashish Solanki

Empty Electric Buses : पारा 40 डिग्री को पार कर चुका है, आसमान से आग गिर रही है और लोग पसीने से लथपथ हैं। ऐसे हालात में ग्रेटर नोएडा वेस्ट के सबसे व्यस्त चौक गौड़ चौक (चार मूर्ति) पर एक चौंकाने वाला दृश्य देखने को मिल रहा है। एक ओर करोड़ों रुपये में बनी नोएडा प्राधिकरण की चमकदार, ठंडी और आरामदायक एसी ई-बसें खड़ी हैं, जिनका कंडक्टर चिल्लाकर सिर्फ 20 रुपये में सेक्टर-52 मेट्रो स्टेशन जाने की अपील कर रहा है। परंतु, जनता इन खाली एसी सीटों को नजरअंदाज करके खिड़कियों के बिना वाले, यात्रियों से भरे ऑटो की तरफ दौड़ रही है।

बसें मांगने वाले ऑटो पर भिड़े

ग्रेनो वेस्ट के निवासी कुछ समय पहले बेहतर सार्वजनिक परिवहन की मांग को लेकर सड़कों पर उतरकर विरोध कर रहे थे। उनकी चिंता थी कि उन्हें जान जोखिम में डालकर ऑटो में यात्रा करनी पड़ रही है। प्राधिकरण ने मेट्रो नहीं दी, लेकिन हर 15 मिनट पर चार मूर्ति से सेक्टर-37 तक चलने वाली शानदार ई-बसें उपलब्ध कराई। लेकिन आज जब बसें चल रही हैं, तो सवारियां अनुपस्थित हैं। 3 सवारी वाले ऑटो में 6-6 लोग भेड़-बकरियों की तरह भरे हुए हैं। स्थिति तब और बिगड़ गई जब ड्राइवर की बगल वाली सीट पर बैठने के लिए यात्री भिड़ते दिखे, लेकिन एसी बस की ओर किसी ने ध्यान नहीं दिया।

बिना यूनिफॉर्म ड्राइवर

इस पूरी जांच के दौरान ई-बस सेवा में कुछ गंभीर खामियां और लापरवाही भी उजागर हुईं:
नियमों की अवहेलना: परिवहन विभाग के नियमों के तहत ड्यूटी के समय चालक और परिचालक को निर्धारित वर्दी पहनना जरूरी है। इसके बावजूद, कई चालक बिना यूनिफॉर्म के साधारण कपड़ों में बसों को चलाते हुए दिखाई दिए।
स्टॉपेज की मनमानी और डिपो की स्थिति: सोमवार दोपहर मोरना बस डिपो पर चार मूर्तियों के लिए एक भी ई-बस समय पर नहीं आई। कई चालक निर्धारित स्टॉप से आगे जाकर बस रोकते हैं। इस लंबी प्रतीक्षा और अव्यवस्था से नाराज होकर कई लोगों ने ₹10 अतिरिक्त देकर ऑटो लेना बेहतर समझा।

हफ्ते भर बाद भी सवारी नहीं बढ़ी

ई-बस सेवा शुरू हुए अब एक हफ्ते से अधिक हो गया है। चालकों का कहना है कि वे हर स्टॉप पर रुकते हैं, लेकिन फिर भी यात्रियों की संख्या अपेक्षानुसार कम है। दूसरी तरफ, जब बस कंडक्टर यात्रियों को समझाने की कोशिश करते हैं, तो ऑटो चालक उनकी बात सुनने के बजाय लड़ाई करने और घूरने लगते हैं। इस स्थिति में बड़ा सवाल यह है कि क्या सिर्फ प्रशासन ही इसके लिए जिम्मेदार है या जनता भी इसे बढ़ावा दे रही है?

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